“हां दिए थे कभी मेरे पापा ने मुझे परियों के पंख नन्हे-नन्हे ख्वाब सजाए घर के आँगन, गलियारों में पापा से मैं पूछती रहती- ये आसमाँ इतना नीला क्यूँ है? पापा कहते इस मशीन-सी व्यस्त जिंदगी में, तुमको सुकूंन देने के लिए मेरी बिटिया रानी। सुनकर जवाब अपने प्यारे पिता का मैं चंचल-हवा सी झूम उठती। मिश्री-से मीठे आम्र तरू पर कभी इस पात तो ,कभी उस पात नाचती -गाती मैं फुदकती रहती। पापा से पूछती रहती कि- ये आम्र इतना मीठा क्यूँ है? पापा कहते ताकि तुम जान सको क्या है अम्रत-सा मीठा है मनका धीर । समय बीतता गया और बचपना भी। छोटी-सी गुड़िया अब बड़ी हो गई। ख्वाब बड़े और दिन छोटे हो गए हैं। छोटी-सी गुड़िया के सपने भी बड़े हो गए हैं।”

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