
हज़ारों चिराग़ ख्वाहिशों के

This beautiful site has created to share a plateform for new comers writers who write with their soul .

हजारो़ं चिराग़ ख्वाहिशों के,
आँखो में यूँ जल रहे हैैं।
दिन का सुकून गुम गया है,
रातो में भी जग रहे हैं।
खुद ने ही खुद का है हाथ थामा,
खुद ही गिर कर संभल रहे हैं।
राह में काँटे बहुत से है लेकिन
कदम से कदम मिलाकर,
फ़िर भी चल रहे हैैं।
कभी कम न हो पाए लौ इसकी यारों ,ये जान –
हवा-ए रुख से भी आज लड़ रहे हैं।
-मालिनी ‘महक’