हाँ देखा है मैने

“हाँ देखा है मैने ,
जिंदगी को बेहद करीब से।
हथेलियों की लकीरों को लड़ते हुए नसीब से॥

होठों पे मुस्कराहट लिए नज़रो को रोते हुए।
मुहब्बत के ताइ़र को क़फ़स में सिसकते हुए॥

बस मे नहीं होता इस कम्बख़त कल्ब को समझा पाना।
हाँ देखा है मैने,
सब्र के कोहसार को मोंम़-सा पिघलते हुए॥

कभी मन्दिर गए तो कभी मस्जिद,
न जाने कितने दरिख्तों पर माथा टेका।
न जाने कितने खानकाहों पर दुआ मांगी हमने॥

मिलता है वही , लिखा है जो रब ने।
क्या पाओगे भला फिजूल की ज़ोर-ए-आजमाइश से॥

चेहरे-पे है चेहरा सबने बनावट का कबां पहन रखा है।
हाँ देखा है ‘महक’ ने,
इन कलयुगी लोगों को
मौसम-सा बदलते हुए॥

हाँ देखा है मैने ,
जिंदगी को बेहद करीब से।
हथेलियों की लकीरों को लड़ते हुए नसीब से॥”

2 Comments

  1. Gagan Gupta's avatar Gagan Gupta says:

    Very Nice lines

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    1. Thank you so much

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